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Saturday, June 10, 2017

बिनसर महादेव मन्दिर(सोनी गांव) व गार्जिया देवी मन्दिर(रामनगर)

23 मार्च 2017
हम लोग कुमाऊँ रेजिमेंट संग्रहालय देखकर तकरीबन सुबह के 11 बजे रानीखेत से चल पडे। हमे आज जिम कार्बेट पार्क के नजदीक रूकना था। इसलिए रानीखेत से सोनी गांव होते हुए मोहान वाला रास्ता चुना गया। वैसे इस रास्ते पर ट्रेफिक बहुत कम है और जरूरी सुविधाओं की भी बहुत कमी है। इसका जिक्र बाद में करेंगे। बहुत पहले एक बार मै इसी रास्ते से रामनगर गया था। तब बहुत से जानवर देखने को मिले थे। हम लोग गनयाडौली पहुचें यही से सोनी के लिए रास्ता अलग हो जाता है। जल्द ही हम तारीखेत (ताडीखेत)  पहुँच गए। यहां पर भी कुछ होटल बने है रूकने के लिए। यहां पर मैने एक दुकान से पानी की बोतलें खरीदी पीने के लिए। यहां से कुछ दूर चलने पर गोलू देवता के मन्दिर के लिए रास्ता अलग हो जाता है वैसे गोलू देवता का मुख्य मन्दिर अलमौडा में है। ताडीखेत में मकान दुकान बन रहे थे इसका मतलब यहां पर भी पर्यटकों को अब बढिया सुविधाएं मिलने लगेगी निकट भविष्य में । सड़क लगभग समानतर ही चल रही थी ना ज्यादा चढाई और ना ज्यादा ऊंचाई। सड़क के दोनो तरफ चीड के पेड दिख रहे थे वह गर्मियों में उनमे लगी आग की निशानी भी दिख रही थी। लगभग चीड का हर पेड नीचे से जला हुआ था। जंगल की यह आग बहुत खतरनाक होती है। वनस्पति को तो नुकसान होता ही है साथ में वायु प्रदुषण व जानवरो के लिए भी यह बेहद खतरनाक साबित होती है।

कुछ ही देर में हम सोनी गांव पहुँच गए। रानीखेत से सोनीगांव लगभग 16 km की दूरी पर है। सोनीगांव से कुछ चलने के ही बाद दाहिंने हाथ पर बीसौना के लिए रास्ता कटता है बस उसी रास्ते पर लगभग 2.5km चलने पर बिनसर महादेव मन्दिर है। इसे रानीखेत का बिनसर भी कहते है एक बिनसर अलमोडा के पास भी है। जहां पर बिनसर वन्य सेंचुरी (अभ्यारण्य) भी है। सोनी का बिनसर महादेव मन्दिर चीड, देवदार व अन्य गगनचुंबी पेडो के बीच बना है। यह समुद्रतल से लगभग 2200 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। इसलिए गर्मीयों में भी यहां पर थोडी ठंड का अहसास बना रहता है। हमे दूर एक मोड से ही इस मन्दिर की भव्यता दिखाई पड रही थी। मन्दिर में घंटे - घंटी का बजाना मना है केवल आरती के समय ही घंटी बजा सकते है। वो इसलिए की यहा पर लोग शांत वातावरण में शांति से ध्यान लगाने आते है। यहां पर एक गुरूकुल भी है जहां पर बच्चे पढते भी है शायद उनकी पढाई में खलल ना पडे इसलिए भी मन्दिर में घंटी बजाना मना हो सकता है।

हमने बाहर ही जूते उतार दिए और मन्दिर की ओर  चले गए। यहां पर फोटोग्राफी व विडियोग्राफी करना मना है। हम सीधे महादेव के मन्दिर मे गए। हमने यहां पर स्थापित प्राचीन शिवलिंग के दर्शन किये। यहां पर हमे कोई नही दिख रहा था। चाहता तो कुछ फोटो ले सकता था पर लिये नही। पास में कुछ मन्दिर और भी बने है। कुछ मन्दिर ऊपर के तल पर भी बने है। जिन्हे देखकर हम वापिस नीचे आ गए। नीचे एक कक्ष में धूनी जल रही थी। एक तरफ नागा बाबा मोहन राम गिरी जी का फोटो लगा हुआ था जिन्होने इस मन्दिर की पुनः स्थापना की थी व दूसरी तरफ नीम करौली बाबा का फोटो लगा हुआ था। इस कक्ष में बडी शांति थी लग रहा था जैसे इस कक्ष में कोई और भी हो। कमरे में हल्का हल्का अंधेरा था। एक ज्योति जल रही थी। थोडी देर बाद एक पंद्रह सोलह साल का एक बालक आया जो यही पर पढता था। उसने हमे खाने के लिए मुरमुरे का प्रसाद दिया। फिर हम मन्दिर से बाहर आ गए। मन्दिर का वातावरण तो दिल को आन्नदित कर ही रहा था लेकिन बाहर का वातावरण उससे भी अच्छा लग रहा था। चारो और देवदार के वक्ष फैले थे। दूर पक्षियो की आवाज आ रही थी। हवा में शीलता का अहसास हो रहा था। ऐसे वातावरण में भला कौन रहना नही चाहेगा।

यह मन्दिर कैसे प्रसिद्ध हुआ इसके पीछे एक कहानी है-- कहानी के अनुसार पहले यहां पर बहुत से मनिहार ( चूड़ी बनाने वाले) रहा करते थे। एक मनिहार की गाय दिन भर जंगल मे चरती व शाम को जब वह वापस लौटती तो उसके थनो में दूध नही होता था। ऐसा हर रोज होता एक बार मनिहार गाय के पीछे जंगल में गया। वहां उसने देखा की गाय के थनो से दूध स्वयं ही निकल रहा है और एक पत्थर पर गिर रहा है। उसने उस पत्थर को तो़ड कर फेंक दिया। फिर किसी मनिहार को स्वप्न दिखलाई दिया जिसमे उन्हे गांव छोडने को कहा। सभी मनिहार गांव को छोड कर चले गए। फिर किसी बूढे दम्पति को जो नि:संतान थे वो वही जंगल में ही रहते थे उन्हे एक दिन सपने मे एक बाबा ने आदेश दिया की पास नदी मे एक शिवलिंग पडा है उसे वहां से निकाल कर पूजा अर्चना करो और निश्चित जगह पर स्थापित करो। बूढे दम्पती ने वैसा ही किया जैसा उन्हे सपने में दिखा। उन्होने शिवलिंग को स्थापित किया बाद में उन पर भगवान की ऐसी कृपा हुई की उन्हें कुछ दिन बाद पुत्र प्राप्ती भी हुई। बाद में जूना अखाडे के नागा बाबा मोहन राम गिरी जी ने यहा पर भव्य मन्दिर बनवाया। आज यहां पर उसी शिव मन्दिर व चमत्कारी शिवलिंग के दर्शन करने काफी भक्त आते है।

रानीखेत से थोड़ा चलते ही 

आ गया बिनसर महादेव मंदिर 

मंदिर का बाहरी प्रवेश द्धार 

मंदिर परिसर 

मंदिर का मुख्य द्वार 

मैं सचिन त्यागी बिनसर महादेव( सोनी ) पर 

अब आगे चलते है 


यहां से हम जिम कार्बेट पार्क की तरफ चल पडे। आज हमे वही रूकना था। कुछ दूर चले तो गाडी का टायर जिसमे हमने पंचर लगाया था वह पंचर हट गया था और हवा निकल रही थी। हमने गाडी को एक तरफ खडा कर, गाडी में रखा दूसरा (स्टपनी) टायर लगा दिया। यह रास्ता कम चलता है। एक्का दुक्का गाडी ही चलती हुई दिख रही थी। एक छोटा सा गांव आया उसके बाद एक जगह सडक टूटी हुई थी शायद कुछ दिन पहले लैंडस्लाईड हुई होगी। इस जगह को आराम से पार किया गया लेकिन एक पत्थर ने हमारा पिछला टायर जो कुछ देर पहले लगाया था वह काट दिया जिसकी वजह से टायर की हवा निकल गई। आसपास कोई दुकान भी नही थी। और यहां से मोहान भी अभी लगभग 28 किलोमीटर दूर था। फिलहाल पुराना पंचर वाला टायर ही लगा दिया और अपने साथ लाए छोटे से कम्प्रैसर से हवा भर दी। हमने रास्ते में पडे कई गांव में पता किया की कोई पंचर लगा दे पर कोई नही मिला। फिलहाल हम हर दस किलोमीटर पर हवा भरते भरते मोहान पहुंचे। हमारा यह सफर बहुत लम्बा व थकान से भरा हुआ महसूस हुआ।

मोहान पहुंच कर दोनो टायर दुरूस्त करवाए और मोहान से आगे चलकर जिम कार्बेट पार्क के धनगढी़ गेट पर पहुँचे। यहां से लोग जिम कार्बेट पार्क में जंगल सफारी करने जाते है। लेकिन हम आए थे यहां पर बने एक संग्रहालय को देखने लेकिन अफसोस वह मरम्मत के चलते बंद था। फिर हम गार्जिया देवी के दर्शन करने के लिए गए। गार्जिया देवी मैं पहले भी दो बार आ चुका हूं। लेकिन हर बार यहां आना अच्छा ही लगता है। गिरिजा देवी(गार्जिया देवी) आसपास के क्षेत्र में बहुत विख्यात है, इनकी बडी मान्यता है। यह हिमालय पुत्री पार्वती का ही एक रूप है। कोसी नदी के बीचो बीच एक छोटी व ऊंची सी चट्टान पर इनका मन्दिर बना है। मान्यता है की यह चट्टान कभी बहती हुई यहां तक आई थी। हम सबने गार्जिया देवी के दर्शन किये व कुछ देर कोसी नदी के तट पर बैठे रहे। देवांग को तो मेने कोसी में नहला भी दिया। लगभग दोपहर के चार बज चुके थे और भूख भी लग रही थी इसलिए हम यहां से रामनगर की तरफ चल पडे। यह रास्ता पूरा जंगल से ही गुजरता है। जंगली जानवर दिखना आम बात है। हमे भी कुछ हिरण दिखलाई पडे। आगे चलकर एक रेस्टोरेंट पर खाना खाया गया। अब रात बिताने के लिए होटल देखे गए कुछ में कमरे ही नही मिले तो कुछ बहुत मंहगे थे। आखिरकार एक नया होटल (कार्बेट कम्फर्ट लॉज) या कहे की रिजॉर्ट मिल गया। थोडा मंहगा था पर बढिया था फाईव स्टॉर होटल की फिलिंग आ रही थी यहां पर हमे। शाम को कुछ हिरण होटल के बाहर ही आ गए थे। होटल के मैनेजर (±918954820106) ने बताया की एक बार तो तेंदुआ आ गया था इधर तब एक हिरण होटल में आ गया था। होटल के बाहर घना जंगल ही था इसलिए शाम को जंगली जानवर दिख ही जाते है। हमने कल सुबह जंगल सफारी के लिए एक जीप भी बुक कर दी जो हमे कल सुबह 6 बजे लेने आ जाएगी। होटल के मैनेजर ने बताया की अगर आपको जंगली जानवर देखने है तो रात को तकरीबन 10 बजे गाडी से इसी सडक पर धनगढी नाला के आसपास हो आना आपको बहुत से जानवर रोड के आसपास ही मिल जाएगे। लेकिन हाथियों से व रास्ते में पडने वाले पानी के नालो से बच कर रहना। मेरा जाना पक्का था लेकिन ललित के छोटे बेटे को तेज बुखार व उल्टियां हो गई। वैसे उसको दवाई दे दी गई लेकिन रात को हमारा सड़क नापने का प्रोग्राम कैंसल हो गया। कुछ देर बाद हमने खाना खाया और सोने के लिए अपने कमरे में चले गए।

रस्ते में पड़ा एक गांव का नाम 

देवांग रस्ते में पड़े हुए  चीड़ के फल /फूल लेता हुआ 



ये रास्ते जो मंजिलो से भी खूबसूरत है 

देवांग 



टायर बदलते हुए ललित त्यागी जी 

फोटो में इस पेड की विशालता का अनुमान नहीं हो रहा है पर ये पेड़ बहुत बड़ा था। 

इस तिराहे पर भी हमने टायर में हवा भरी 





कोसी नदी 

गर्जिया देवी व कोसी नदी 

गर्जिया देवी मंदिर ,रामनगर 

जय माँ गिरिजा देवी 



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होटल की दूसरी तरफ जंगल 



होटल जिसमे हम ठहरे थे 
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Thursday, May 18, 2017

रानीखेत यात्रा- कुमाँऊ रेजिमेंट म्यूजियम


कुमाऊं रेजिमेंट का संग्रालय, रानीखेत उत्तराखंड 

23 मार्च 2017 
सुबह 5:30 का मोबाइल में अलार्म भरा होता है। इसलिए आज भी सुबह 5:30 पर ऊठ गया। उठते ही कमरे से बाहर बॉलकनी में आ बैठा लेकिन बाहर अभी अंधेरा था। थोडी देर बाद कमरे में आकर पानी पीया और फिर बॉलकनी में चला गया। बाहर चिड़ियों की आवाज आ रही थी। यह बहुत प्यारी अावाज होती है। लगता है जैसे चिडिया ने कोई मधुर राग छेड दिया हो सुबह की इस मनोरम छटा में। कुछ देर बाद हल्का हल्का अंधेरा छटता गया और सामने हिमालय की ऊंची स्वेत पहाड़िया जो अभी तक अंधेरे की वजह से दिख नही रही थी अब दिखने लगी थी। नीचे गांव से लोगो की आवाज भी सुनने को आनी लगी थी। शायद वो अपने कार्यो पर लग गए होंगे। सामने का नजारा हर मिनट पर बदल रहा था हिमालय की ऊंची चोटियां भी अपना रंग बदल रही थी। शुरू मे जो काली दिख रही थी वह कभी लाल तो कभी भूरी दिख रही थी। सूर्योदय की ऐसी छटा देखना मन,  मस्तिष्क को बहुत शांति देता है। कुछ देर बाद विराट हिमालय साफ साफ नजर आ रहा था। एक दम साफ बर्फ से ढका दिख रहा था। चौखम्बा भी थोडी सी दिख रही थी। त्रिशुल पर्वत व नंदा देवी तो एक दम साफ दिख रही थी कुछ और पर्वत भी दिख रहे थे लेकिन मै इनका नाम नही जानता था। इन हिमालय पर्वत की चोटियों पर जाना बेहद दुर्गम होता है। कुछ लोग यहां तक जाते भी है। कुछ लोग पैदल इसके बहुत नजदीक चले जाते है। जहां से इनको और नजदीकी से देख सकते है। ऐसे लोगो को ट्रैकर कहा जाता है और ऐसी पैदल यात्रा को ट्रैकिंग । कुछ लोग हमारे जैसे भी होते है जो इन्हे दूर से ही आंखो से देखकर खुश हो जाते है। मतलब हिमालय सबको अपनी तरफ आकर्षित करता है। और लोग इसे देखकर आंनद लेते हैं।

सुबह सुबह अभी कुछ अँधेरा है। 

अब सूर्योदय होने वाला है 

अब कुछ धूप आती हुई 

बच्चे भी आ गए है 

अब त्रिशूल पर्वत व अन्य पर्वत दिख रहे है। 

ऐसी जगह हाई ज़ूम वाला कैमरा होना चाइए होता है। मेरे पास सामान्य कैमरा था 

यह भी सुबहे का नजारा था। 

त्रिशूल पर्वत व नंदा देवी व नंदा देवी ईस्ट पर्वत श्रंखला 


मैं सचिन त्यागी 


किसान खेत जोतते हुए 

 नैणी गांव तक जाती एक पगडंडी 



डाइनिंग हॉल से दीखता विराट हिमायल की पर्वत श्रंखला 




बू बू आश्रम व मंदिर , रानीखेत 

मैं इस नजारे को देखकर बहुत खुश था। साथ मे देवांग व दोनो बच्चे वह भी मेरे साथ हिमालय की इन खूबसूरत पर्वतमाला को देखकर आंनद ले रहे थे। थोडी देर बाद चाय आ गई। चाय पीने के बाद नहा धौकर हम सब तैयार हो गए। जब तक नाश्ता तैयार होता है तब तक हम नीचे गांव की तरफ चल पडे। गांव के कुछ मजदूर ऊपर से सिमेंट व भवन निमार्ण सामाग्री नीचे गांव की और ले जा रहे थे। पहाडो पर भवन निर्माण की कीमत ऐसे ही बहुत बढ जाती है। क्योकी समान को इधर से उधर ले जाना होता है। नीचे गांव में बच्चे खेल रहे थे। और कुछ किसान बैल द्वारा चलित हल से खेत मे जुताई कर रहे थे। जो बैल को आवाज देकर आगे पीछे कर रहे थे। हमे यह सब देखना बहुत अच्छा लग रहा था। गाय भैंस के गौबर से बने उपले( कंडे)  जिन्हें इंधन के रूप मे भी उपयोग किया जाता है। उनको एक विशेष प्रकार से सम्भाल कर रखा जाता है जिसके लिए कुछ झौपडी टाईप जगह बनाई जाती है। उसे भी हम देखकर आए। कुछ देर बाद होटल से बुलावा आ गया नाश्ते के लिए और हम वापिस चल पडे।

होटल में एक डायनिंग हॉल बना है। हॉल से भी हिमालय की सुंदर पर्वतमाला के दर्शन हो रहे थे। मेरे पास ज्यादा ज़ूम वाला कैमरा नहीं था ऐसी जगह ज्यादा ज़ूम वाला कैमरा ही काम आता है क्योकि जो हम देख रहे है उसे और ज्यादा पास से देख लेते है। नाश्ता लग चूका था, नाश्ते में मैने दही और परांठे लिए। बच्चो के लिए गर्म दूध ले लिया। नाश्ता अच्छा बना था। होटल के रहने व खाने पीने का बिल अदा कर हम वहां से चल पडे। कुछ दूर पर बूबू आश्रम बना था। आश्रम में मन्दिर भी बना है, मन्दिर में दर्शन कर हम आगे चल पडे।

हम सीधा रानीखेत के कुमाऊँ रेजिमेंट के संग्रहालय पहुँचे। हमसे पहले तकरीबन दस लोग और वहां पर मौजूद थे। 25 रू एंट्री फीस लगती है संग्रहालय में अंदर प्रवेश करने के लिए। किसी भी तरह की फोटोग्राफी व वीडियोग्राफी करना मना है। अब लगभग म्यूजियम देखने वाले पर्यटकों की संख्या 20 से ऊपर हो चुकी थी। यहां पर हमे एक रिटायर्ड आर्मी मैन मिले जिन्होने बताया की वह कोई गाईड नही है लेकिन वह हर आने वाले व्यक्ति को यह संग्रहालय घुमाते है। अपनी भारतीय सेना व कुमाऊँ रेजिमेंट के बारे में बताते है जिससे उन्हे बहुत अच्छा लगता है। पहले उन्होने सेना मे दिए जाने वाले चक्रो के बारे मे बताया उन्होने बताया की परमवीर चक्र से बडा कोई च्रक नही होता है। उन्होने बताया की कुमायूँ रेजीमेन्ट के मेजर सोमनाथ शर्मा 1947 में श्रीनगर में हुयी लड़ाई में  पराक्रम दिखाते हुये शहीद हुए उनके मरणोपरान्त देश का पहला परमवीर चक्र उनको प्राप्त हुआ। सन् 1962 में भारत व चीन के युद्ध में मेजर शैतान सिंह भाटी ने वही शौर्य और पराक्रम दिखाते हुये कुमायूँ रेजीमेंट का दूसरा परमवीर चक्र प्राप्त किया। उन्होंने बताया की जब भारत अंग्रेजो के आधीन था तब भी कुमाऊँ रेजिमेंट कार्यशील थी। लेकिन भारत के आजाद होने पर इस रेजीमेंट ने हमेशा भारतीय सेना का मान ऊंचा किया है। कारगिल वार में कैसे भारतीय सेना ने पाकिस्तान को धूल चटाई उसके बारे मे भी बताया। एक जगह पाकिस्तान का झंडा उल्टा लटका हुआ था तब उन्होने बताया की हमारी सेना ने कई बार पाकिस्तान को हराया है इसलिए उसका झंडा यहां पर उल्टा लटका हुआ उनकी हार की गवाही दे रहा है। यहां पर हमने विश्वयुद्ध में पकडी गई चीनी राईफल, जापानी वायरलेस व गोले, बंदुके आदि कई चीजे देखी। जो हमे हमारी सेना पर गर्व करा रही थी। यहां पर कुछ युद्घपोतो के छोटे प्रारूप भी रखे थे। बार्डर पर तैनात जवानो के लिए दी गई गन व बंदुको के बारे में यहां जानने को मिला। पहले की सेना की वर्दी व समय समय पर क्या इसमे बदलाव हुए वह यहां पर देखने को मिला। यहां पर झांसी की रानी का राज दंड भी रखा हुआ है। यहां पर शहीद हुए सैनिको के ताबुत भी देखे। यहां पर बहुत सी चीजे देखी जिनका वर्णन करते करते मै थक जाऊंगा इसलिए यही कहूंगा की आप जब भी रानीखेत आओ तो कुमाऊँ रेजिमेंट के म्यूजियम जरूर जाना।

जो रिटायर्ड आर्मी मैन हमे संग्रहालय घुमा रहे थे वह बहुत हंसमुख व मजाकिया किस्म के थे। वह बार बार बच्चो व महिलाओं से कह रहे थे की जब आप पूरा संग्रहालय घुम लोगे तब मै आपको एक गिफ्ट दूंगा अगर आप उसे ऊठा कर ले गए तो वह आपकी होगी। जब सबसे शांति से पूरा संग्रहालय घुम लिया तब वह कहने लगे की संग्रहालय के बाहर दो एंटी एयरक्राफ्ट गन खडी है जो उठा कर ले जा सकता है ले जाए नही तो अपने कैमरे से उनकी फोटो ही ले जाएं। मै मना नही करूंगा सब लोग उनके इसी कहने पर बहुत हंसे। हमने भी उनको धन्यवाद किया और म्यूजियम से बाहर आ गए और चल पडे अगले सफर की ओर.......

अब कुछ फोटो देखे। .... 
म्यूजियम के बाहर 

कुमांऊ रेजिमेंट का म्यूजियम , रानीखेत 

देवांग व उसका गिफ्ट अगर वो ले जा सके इसलिए फोटो ही ले लिया 

बच्चे यहाँ आकर बड़े ही खुश थे।