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Thursday, May 18, 2017

रानीखेत यात्रा- कुमाँऊ रेजिमेंट म्यूजियम


कुमाऊं रेजिमेंट का संग्रालय, रानीखेत उत्तराखंड 

23 मार्च 2017 
सुबह 5:30 का मोबाइल में अलार्म भरा होता है। इसलिए आज भी सुबह 5:30 पर ऊठ गया। उठते ही कमरे से बाहर बॉलकनी में आ बैठा लेकिन बाहर अभी अंधेरा था। थोडी देर बाद कमरे में आकर पानी पीया और फिर बॉलकनी में चला गया। बाहर चिड़ियों की आवाज आ रही थी। यह बहुत प्यारी अावाज होती है। लगता है जैसे चिडिया ने कोई मधुर राग छेड दिया हो सुबह की इस मनोरम छटा में। कुछ देर बाद हल्का हल्का अंधेरा छटता गया और सामने हिमालय की ऊंची स्वेत पहाड़िया जो अभी तक अंधेरे की वजह से दिख नही रही थी अब दिखने लगी थी। नीचे गांव से लोगो की आवाज भी सुनने को आनी लगी थी। शायद वो अपने कार्यो पर लग गए होंगे। सामने का नजारा हर मिनट पर बदल रहा था हिमालय की ऊंची चोटियां भी अपना रंग बदल रही थी। शुरू मे जो काली दिख रही थी वह कभी लाल तो कभी भूरी दिख रही थी। सूर्योदय की ऐसी छटा देखना मन,  मस्तिष्क को बहुत शांति देता है। कुछ देर बाद विराट हिमालय साफ साफ नजर आ रहा था। एक दम साफ बर्फ से ढका दिख रहा था। चौखम्बा भी थोडी सी दिख रही थी। त्रिशुल पर्वत व नंदा देवी तो एक दम साफ दिख रही थी कुछ और पर्वत भी दिख रहे थे लेकिन मै इनका नाम नही जानता था। इन हिमालय पर्वत की चोटियों पर जाना बेहद दुर्गम होता है। कुछ लोग यहां तक जाते भी है। कुछ लोग पैदल इसके बहुत नजदीक चले जाते है। जहां से इनको और नजदीकी से देख सकते है। ऐसे लोगो को ट्रैकर कहा जाता है और ऐसी पैदल यात्रा को ट्रैकिंग । कुछ लोग हमारे जैसे भी होते है जो इन्हे दूर से ही आंखो से देखकर खुश हो जाते है। मतलब हिमालय सबको अपनी तरफ आकर्षित करता है। और लोग इसे देखकर आंनद लेते हैं।

सुबह सुबह अभी कुछ अँधेरा है। 

अब सूर्योदय होने वाला है 

अब कुछ धूप आती हुई 

बच्चे भी आ गए है 

अब त्रिशूल पर्वत व अन्य पर्वत दिख रहे है। 

ऐसी जगह हाई ज़ूम वाला कैमरा होना चाइए होता है। मेरे पास सामान्य कैमरा था 

यह भी सुबहे का नजारा था। 

त्रिशूल पर्वत व नंदा देवी व नंदा देवी ईस्ट पर्वत श्रंखला 


मैं सचिन त्यागी 


किसान खेत जोतते हुए 

 नैणी गांव तक जाती एक पगडंडी 



डाइनिंग हॉल से दीखता विराट हिमायल की पर्वत श्रंखला 




बू बू आश्रम व मंदिर , रानीखेत 

मैं इस नजारे को देखकर बहुत खुश था। साथ मे देवांग व दोनो बच्चे वह भी मेरे साथ हिमालय की इन खूबसूरत पर्वतमाला को देखकर आंनद ले रहे थे। थोडी देर बाद चाय आ गई। चाय पीने के बाद नहा धौकर हम सब तैयार हो गए। जब तक नाश्ता तैयार होता है तब तक हम नीचे गांव की तरफ चल पडे। गांव के कुछ मजदूर ऊपर से सिमेंट व भवन निमार्ण सामाग्री नीचे गांव की और ले जा रहे थे। पहाडो पर भवन निर्माण की कीमत ऐसे ही बहुत बढ जाती है। क्योकी समान को इधर से उधर ले जाना होता है। नीचे गांव में बच्चे खेल रहे थे। और कुछ किसान बैल द्वारा चलित हल से खेत मे जुताई कर रहे थे। जो बैल को आवाज देकर आगे पीछे कर रहे थे। हमे यह सब देखना बहुत अच्छा लग रहा था। गाय भैंस के गौबर से बने उपले( कंडे)  जिन्हें इंधन के रूप मे भी उपयोग किया जाता है। उनको एक विशेष प्रकार से सम्भाल कर रखा जाता है जिसके लिए कुछ झौपडी टाईप जगह बनाई जाती है। उसे भी हम देखकर आए। कुछ देर बाद होटल से बुलावा आ गया नाश्ते के लिए और हम वापिस चल पडे।

होटल में एक डायनिंग हॉल बना है। हॉल से भी हिमालय की सुंदर पर्वतमाला के दर्शन हो रहे थे। मेरे पास ज्यादा ज़ूम वाला कैमरा नहीं था ऐसी जगह ज्यादा ज़ूम वाला कैमरा ही काम आता है क्योकि जो हम देख रहे है उसे और ज्यादा पास से देख लेते है। नाश्ता लग चूका था, नाश्ते में मैने दही और परांठे लिए। बच्चो के लिए गर्म दूध ले लिया। नाश्ता अच्छा बना था। होटल के रहने व खाने पीने का बिल अदा कर हम वहां से चल पडे। कुछ दूर पर बूबू आश्रम बना था। आश्रम में मन्दिर भी बना है, मन्दिर में दर्शन कर हम आगे चल पडे।

हम सीधा रानीखेत के कुमाऊँ रेजिमेंट के संग्रहालय पहुँचे। हमसे पहले तकरीबन दस लोग और वहां पर मौजूद थे। 25 रू एंट्री फीस लगती है संग्रहालय में अंदर प्रवेश करने के लिए। किसी भी तरह की फोटोग्राफी व वीडियोग्राफी करना मना है। अब लगभग म्यूजियम देखने वाले पर्यटकों की संख्या 20 से ऊपर हो चुकी थी। यहां पर हमे एक रिटायर्ड आर्मी मैन मिले जिन्होने बताया की वह कोई गाईड नही है लेकिन वह हर आने वाले व्यक्ति को यह संग्रहालय घुमाते है। अपनी भारतीय सेना व कुमाऊँ रेजिमेंट के बारे में बताते है जिससे उन्हे बहुत अच्छा लगता है। पहले उन्होने सेना मे दिए जाने वाले चक्रो के बारे मे बताया उन्होने बताया की परमवीर चक्र से बडा कोई च्रक नही होता है। उन्होने बताया की कुमायूँ रेजीमेन्ट के मेजर सोमनाथ शर्मा 1947 में श्रीनगर में हुयी लड़ाई में  पराक्रम दिखाते हुये शहीद हुए उनके मरणोपरान्त देश का पहला परमवीर चक्र उनको प्राप्त हुआ। सन् 1962 में भारत व चीन के युद्ध में मेजर शैतान सिंह भाटी ने वही शौर्य और पराक्रम दिखाते हुये कुमायूँ रेजीमेंट का दूसरा परमवीर चक्र प्राप्त किया। उन्होंने बताया की जब भारत अंग्रेजो के आधीन था तब भी कुमाऊँ रेजिमेंट कार्यशील थी। लेकिन भारत के आजाद होने पर इस रेजीमेंट ने हमेशा भारतीय सेना का मान ऊंचा किया है। कारगिल वार में कैसे भारतीय सेना ने पाकिस्तान को धूल चटाई उसके बारे मे भी बताया। एक जगह पाकिस्तान का झंडा उल्टा लटका हुआ था तब उन्होने बताया की हमारी सेना ने कई बार पाकिस्तान को हराया है इसलिए उसका झंडा यहां पर उल्टा लटका हुआ उनकी हार की गवाही दे रहा है। यहां पर हमने विश्वयुद्ध में पकडी गई चीनी राईफल, जापानी वायरलेस व गोले, बंदुके आदि कई चीजे देखी। जो हमे हमारी सेना पर गर्व करा रही थी। यहां पर कुछ युद्घपोतो के छोटे प्रारूप भी रखे थे। बार्डर पर तैनात जवानो के लिए दी गई गन व बंदुको के बारे में यहां जानने को मिला। पहले की सेना की वर्दी व समय समय पर क्या इसमे बदलाव हुए वह यहां पर देखने को मिला। यहां पर झांसी की रानी का राज दंड भी रखा हुआ है। यहां पर शहीद हुए सैनिको के ताबुत भी देखे। यहां पर बहुत सी चीजे देखी जिनका वर्णन करते करते मै थक जाऊंगा इसलिए यही कहूंगा की आप जब भी रानीखेत आओ तो कुमाऊँ रेजिमेंट के म्यूजियम जरूर जाना।

जो रिटायर्ड आर्मी मैन हमे संग्रहालय घुमा रहे थे वह बहुत हंसमुख व मजाकिया किस्म के थे। वह बार बार बच्चो व महिलाओं से कह रहे थे की जब आप पूरा संग्रहालय घुम लोगे तब मै आपको एक गिफ्ट दूंगा अगर आप उसे ऊठा कर ले गए तो वह आपकी होगी। जब सबसे शांति से पूरा संग्रहालय घुम लिया तब वह कहने लगे की संग्रहालय के बाहर दो एंटी एयरक्राफ्ट गन खडी है जो उठा कर ले जा सकता है ले जाए नही तो अपने कैमरे से उनकी फोटो ही ले जाएं। मै मना नही करूंगा सब लोग उनके इसी कहने पर बहुत हंसे। हमने भी उनको धन्यवाद किया और म्यूजियम से बाहर आ गए और चल पडे अगले सफर की ओर.......

आगे का भाग पढ़े। .. 
अब कुछ फोटो देखे। .... 
म्यूजियम के बाहर 

कुमांऊ रेजिमेंट का म्यूजियम , रानीखेत 

देवांग व उसका गिफ्ट अगर वो ले जा सके इसलिए फोटो ही ले लिया 

बच्चे यहाँ आकर बड़े ही खुश थे। 



Wednesday, May 10, 2017

रानीखेत यात्रा- झूला देवी मन्दिर व गोल्फ कोर्स मैदान



22 मार्च 2017
कैंची धाम से चलने चलने में ही दोपहर के 2 बज चुके थे। यहां से रानीखेत तक की दूरी मात्र 40 किलोमीटर ही है। और रास्ता भी कुछ दूर उतराई व फिर चढाई वाला है। रानीखेत पहुँचते पहुँचते दोपहर के 3:15 हो गए। रानीखेत से कुछ पहले एक रास्ता सौनी बिनसर को चला जाता है। जहां पर बिनसर महादेव मन्दिर व आश्रम है। हम सीधे चलते रहे। आगे चलकर एक रास्ता  श्रीनगर को चला जाता है। पर हम सीधा रास्ता पकडे रहे। रानीखेत परेड ग्राउंड पर जाकर गाडी रोक दी। परेड ग्राउंड में काफी जवान मार्च फास्ट कर रहे थे। यहां से चलकर हम सीधा रानीखेत गोल्फ कोर्स के सामने से होते हुए। नैणी गांव रूके। नैणी गांव में बहुत होटल बने है और यह रास्ता आगे सोमेश्वर चला जाता है। शायद यहां से लगभग 30 किलोमीटर के आसपास ही है। हमने एक दो होटल देखे पर कुछ मंहगे लगे तो कुछ से सामने दिख रही बर्फ से ढंकी हिमालय की पहाडियों के दर्शन नही हो रहे थे। मै ऐसा होटल चाह रहा था जहां से यह नजारा दिखता रहे। खैर एक होटल मिल गया। नया बना है और उसका पहला सीजन ही है। होटल का नाम सहज था। इसके मैनेजर योगेंद्र जी (±919456721683) है। यही इस होटल की देख रेख कर रहे है। होटल में बडे बडे व साफ सुथरे कमरे है। मेरे पंसद वाले कमरे से ही हिमालय दिख रहा था। दो कमरो के एक रात रूकने के 2000 रू तय कर दिए। यानी 1000 प्रति कमरा। जगह व होटल को देखकर यह मंहगा सौदा नही था। जल्दी जल्दी समान रख व हाथ मुंह धोकर हम रानीखेत गोल्फ कोर्स मैदान पहुंचे।

रानीखेत का गोल्फ कोर्स 

रानीखेत:-- रानीखेत उत्तराखंड का एक प्रसिद्ध व रमणीक पर्यटन स्थल है। यह समुंद्र की सतह से लगभग 1870 मीटर की ऊंचाई पर बसा है। इस शहर को भी अंग्रेजी हुकुमत ने बसाया था। उन्होने यहां पर अपनी सेना की छावनी स्थापित की। आज भी इस शहर में कुमाऊँ रेजिमेंट का मुख्यालय स्थापित है। सेना का शासन होने के कारण यह शहर सुंदर व साफ सफाई से पूर्ण है। कहते है की पहले कभी कोई रानी यहां की सुंदरता को देखकर यही बस गई थी। तब से इस जगह का नाम रानीखेत पड गया। यह बात कितनी सच यह तो कह नही सकता लेकिन रानीखेत की सुंदरता का वर्णन कैसे करूं क्योकी यहां पर हर जगह ही बहुत सुंदर है। उत्तराखंड के बाकी शहरो की तरह यहां पर होटल की भरमार, शोर शराबा नही है। यहां पर शांति है। मन्दिर है, पार्क है, जंगल है, सेना के जवान व संग्रहालय है, यहां पर चहकते पक्षी है, यहां से विराट हिमालय के दर्शन होते है। और क्या कहूं मै रानीखेत के संदर्भ में। इतना ही कहूंगा की रानीखेत बहुत सुंदर जगह है। रानीखेत से नैनीताल की दूरी 64 किलोमीटर व अलमोडा मात्र 48 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। रानीखेत से कौसानी भी ज्यादा दूर नही है। रानीखेत में काफी दर्शनीय स्थल है- जैसे रानीखेत कुमाऊँ रेजिमेंट का संग्रहालय, झूलादेवी मन्दिर, रानीझील, बूबू आश्रम, हेडाखान मन्दिर, कलिका मन्दिर, चौबुटिया गार्डन, गोल्फ कोर्स, बिनसर महादेव मन्दिर।

हम लगभग शाम के 5:30 पर रानीखेत गोल्फ कोर्स गार्डन पहुंचे। यह गोल्फ कोर्स एशिया के सबसे ऊंचे गोल्फ कोर्स में से एक है। यह नौ छेदो वाला गोल्फ कोर्स है। यह रानीखेत का प्रसिद्ध जगह है। रानीखेत आने वाले पर्यटक यहां जरूर आते है। यह एक लम्बा चौड़ा मैदान है जो ऊंचा नीचा बना है। यहा पर हरी व अच्छे से कटी घास बडी सुंदर लगती है। चीड का जंगल इस मैदान के तीनो तरफ फैला है। मैं पहले भी एक दफा यहां आया था। उस समय यहां पर विवाह फिल्म की सुटिंग हो रही थी। काफी हलचल थी उस समय यहाँ पर। लेकिन आज यहां पर हमारे अलावा गिनती के दो चार लोग ही थे। लम्बा चौड़ा मैदान देख तीनो बच्चे मस्ती में इधर उधर भागने लगे। बच्चो को यहां पर बडा मजा आ रहा था। दो तीन लोग गोल्फ खेलने की किट लिए जा रहे थे। हम कुछ देर यहां पर बैठे रहे। फिर यहां से गाडी में सवार हो कर आगे चल पडे।
रानीखेत 

होटल सहज 

रानीखेत गोल्फ कोर्स मैदान 

मैं (सचिन) और देवांग 

खुले मैदान और पीछे चीड़ के पेड़ 




बंदरो की टोली 




रानीखेत कैंट एरिया पहुंचे। यह एक सुंदर साफ एरिया है। यही पास में रानी झील भी है। लेकिन हम यहां के एक प्रसिद्ध मन्दिर झूला देवी जा रहें थे। पास में ही कुमाऊँ रेजिमेंट का संग्रहालय भी है लेकिन वो इस समय बंद था उसको सुबह घुमा जाएगा। रानीखेत मॉल रोड होते हुए हम झूला देवी मन्दिर पहुंच गए।

झूला देवी मन्दिर:--
झूला देवी मन्दिर रानीखेत का प्रसिद्ध मन्दिर है। यह मन्दिर माता दुर्गा को समर्पित है। और लोग यहां पर बडी आस्था के साथ आते है मनौती मांगते है और ऐसा विश्वास है की यहां पर माता उन मनोकामनाओं को पूर्ण भी करती है। मनोकामनाएं मांगने वाले लोग यहां पर एक घंटी बांध कर जाते है। और मनोकामना पूर्ण होने पर इस घंटी को खोलने की भी आवश्यकता नही है। पहले यहां पर बलि प्रथा थी लेकिन फिर बलि प्रथा पर रोक लगा दी गई और घंटा या घंटी बांधने की पहल हुई। मन्दिर के बारे में एक कहानी भी है। कहानी के अनुसार बहुत पहले यह जगह बहुत बडा जंगल होता था। यहां पर जंगली जानवर गांव वालो को बहुत कष्ट देते थे। कभी उन पर हमला कर देते थे तो कभी उनके पालतु जानवरो को मार देते थे। शेर, चीते को बहुत डर था यहां पर। एक बार गांव वालो ने देवी की स्तुति की। माता ने प्रसन्न होकर एक गांव पिलखोली के व्यक्ति को सपने में दर्शन दिए और बताया की एक विशेष स्थान पर खुदाई करो वहां पर मेरी प्रतिमा निकलेगी उसी जगह मन्दिर बना कर मेरी पूजा अर्चना करो तुम्हारी व गांव वालो की सभी समस्याएं दूर हो जाएगी। बाद में जब यह बात सभी को पता चली तो उन्होने एक स्थान पर खुदाई की। खुदाई में एक देवी की प्रतिमा मिली। वही पर मन्दिर बनवाया गया और पूजा अर्चना की गई। माता के आशिर्वाद से गांव में जंगली जानवरों का आंतक ठहर गया। तब से आजतक यहां पर माता की पूजा की जाती रही है। इस मन्दिर का नाम झूला देवी कैसे पडा इस विषय पर भी एक कहानी है। कहानी के अनुसार मन्दिर में कुछ बच्चे सावन में झूला झूल रहे थे किसी को स्वप्न में माता के दर्शन हुए। माता ने भी झूला झूलने की इक्च्छा जाहिर की। अगले ही दिन माता की मूर्ति को झूला झूलाया गया तभी से यह देवी झूला देवी के नाम से प्रसिद्ध हुई और यह मन्दिर झूला देवी मन्दिर के नाम से।

हम लगभग शाम के 6:30 पर झूला देवी मन्दिर पहुंचे। मन्दिर तक गाडी चली जाती है। छोटा सा ही मन्दिर है। मन्दिर के अंदर बहुत सी घंटिया हर जगह बंधी हुई है। इनको देखकर ही पता चलता है की इस मन्दिर के प्रति लोगो की बहुत आस्था है। जब हम मन्दिर पहुँचे तो मन्दिर में कोई नही था। कुछ देर बाद एक महिला आई जो मन्दिर में ही बने एक कमरे में रहती है और वही इस मन्दिर की पूजा पाठ करती है। मतलब मन्दिर की पूजारीन वही है। महिला से हमने प्रसाद चढवाया व मन्दिर के बारे में जानकारी भी ली। मन्दिर के बाहर जहां से हमने प्रसाद लिया था वह भी इन्ही ही की दुकान है। मन्दिर में भैरव नाथ व अन्य कुछ और भी देवता के मन्दिर बने है। लेकिन ज्यादा आकृषित मन्दिर में लगी घंटे घंटिया लग रही थी। मेरे साथ आए मेरे साले ललित ने भी एक मनोकामना की घंटी यहां पर बांध दी। अब अंधेरा हो चला था और भूख भी जोरो से लग रही थी। इसलिए अब हम लोग मन्दिर से चल पडे। और रानीखेत के मैन बाजार जिसे सदर बाजार कहते है वहां पर एक रेस्टोरेंट में खाना खाने पहुंचे। कुछ देर बाद खाना आ गया। खाना खाने के पश्चात हमने बराबर में एक मिष्ठान की दुकान से कुछ बाल मिठाई ली खाने के लिए। बाल मिठाई ताजी थी इसलिए स्वाद भी बढिया लग रहा था। अब हम यहां से चल पडे। अब लगभग रानीखेत विरान नजर आ रहा था। लग रहा था की यहां पर कोई रहता ही नही है। गोल्फ कोर्स पहुँचे। वहा से कुछ किलोमीटर आगे चलते हुए होटल सहज पहुचं गए। और फिर सोने के लिए अपने अपने कमरो में चले गए।
झूला देवी मंदिर , रानीखेत 


झूला देवी की मूर्ति 

झूला देवी का मुख्य मंदिर 

एक अन्य मंदिर 

मंदिर और घंटिया 

मंदिर में लगी घंटे ,घंटिया जिन्हे लोगो ने मन्नत के लिए बाँधी है। 



Monday, May 1, 2017

नैनीताल Zoo और कैंची धाम मन्दिर


22 , मार्च,  2017
सुबह 5:30 पर मोबाइल में अलार्म बज ऊठा। जल्द ही बिस्तर छोड दिया। सुबह की चाय की बडी जबरदस्त तलब ऊठी पर होटल में 7 बजे के बाद ही चाय मिलेगी । इसलिए मै होटल से बाहर आ गया और मुझे साथ में बच्चो के लिए गर्म दूध लेना था। लकिन मॉल रोड पर अभी सन्नाटा पसरा हुआ था। इक्का दुक्का सुबह की सैर पर जाने वाले ही इधर उधर घुम रहे थे। हवा तेज थी बाकी ठण्ड नहींलग रही थी।  मैं तल्लीताल बस स्टैंड की तरफ चल पडा। एक जगह दुकान दिखी पर उसपर दूध नही था इसलिए चाय नही बन सकती थी। उसके बाद मेने चाय पीने का विचार ही छोड दिया। हां एक बात रात को मुझे वॉटसेप चैट पर पता चला की हमारे एक घुमक्कड दोस्त( प्रतीक गाँधी ) जो की मुम्बई से है और आजकल उत्तराखंड भ्रमण पर है वो भी नैनीताल रूके है। कल रात मैने उन्हे फोन लगाया था लेकिन बात नही हो पाई। सुबह उनका ध्यान आया तो उनको फोन मिलाया लेकिन फोन बंद था। मैने फिर उनको वटसप पर मैसेज डाल दिया। मेरी सुबह की सैर हो चुकी थी और चाय ,दूध कुछ नहीं मिला इसलिए वापिस होटल आ गया।

होटल पहुंच कर देखा तो लगभग सभी तैयार थे मैं भी जल्द ही नहा -धोकर तैयार हो गया।  हमने नाश्ता होटल में ही कर लिया।  नाश्ता करने के बाद हम होटल से चैकआऊट कर ही रहे थे की मैने एक वेटर से पूछा की क्या मेरी कार zoo तक चली जाएगी। तब उसने बताया की नही आपकी कार ऊपर नही जा सकती है नीचे से zoo तक टैक्सी चलती है 40 रूपये लेती है लौटफेर के। मैने अपने सारे बैग होटल मे ही छोडना चाहे,  लेकिन उस वेटर ने कहा की आप पार्किग में से गाडी ले आओ,  वही टैक्सी स्टेंड पर लगा देना और टैक्सी से zoo तक चले जाना। मैं अपनी कार पार्किंग से लेकर आ गया । सारा समान रख कर टैक्सी स्टैंड पहुंचे आने जाने की टिकेट कटाई और कार उधर ही पार्क कर दी। लेकिन टैक्सी स्टैंड पर बैठे व्यक्ति ने मुझे बताया की इसको पार्किंग में ही खडी करो। नही तो आपका चालान कट जाएगा। क्या ना करता वापिस पार्किग पर गाडी खडी कर आया ऊपर से 100 रूपए और देने पडे। पार्किंग से रिक्शा पकड में टैक्सी स्टैंड पहुँचा ।
सही 10 बजे टैक्सी आ गई और कुछ ही मिनटो में हम ऊपर ज़ू के लिए चल पडे। zoo पहुंचने पर सबसे पहले टिकेट खरीदे अभी ज़ू खुला नहीं था इसलिए कैंटीन में गरमा गर्म मैगी खा ली। कुछ ही देर बाद ज़ू का गेट खुल गया और हम अंदर चले गए। तभी मेरा फोन बज ऊठा। देखा तो प्रतिक गांधी का फोन था। मैने सुबह उनको फोन मिलाया था लेकिन वो रिसीव नही कर सके थे। मैने उन्हे बताया की मै नैनीताल zoo पर हूं उनका होटल भी पास में ही था वह पांच मिनट में ही मुझसे मिलने आ गए। उनसे यह मुलाकात बहुत छोटी रही बस कहां कहां घुमे यही बात होती रही मैने प्रतिक को zoo देखने का निमंत्रण भी दिया। लेकिन उन्हे आज दो तीन जगह देखकर दिल्ली पहुंचना था। क्योकी परसो उनकी मुम्बई की ट्रेन थी। इसलिए मैने ज्यादा जोर नही दिया नही तो मुझे उनके साथ बातचीत करने का और अवसर मिल जाता। भविष्य में मिलेगे यह कहकर प्रतिक वहां से चले गए। मुझे उनसे मिलकर बहुत अच्छा लगा जबकी मै उनसे दूसरी बार ही मिल रहा था लेकिन चैटिंग रोजाना होती रहती है। प्रतीक के जाने के बाद मै भी ज़ू  में वापिस पहुँचा।

nainital zoo


नैनीताल Zoo :--नैनीताल का चिड़ियाघर(ZOO ) बस अड्डे से करीब 1 किमी दूर है।  इसका नाम उत्तर प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री और स्वतंत्रता सेनानी गोविंद बल्लभ पंत के नाम पर रखा गया है।  चिड़ि‍याघर में बंदर से लेकर हिमालय का काला भालू, तेंदुए, बाघ, तिब्बती  भेड़िया, चमकीले तितर, गुलाबी गर्दन वाले पक्षी व बहुत से अन्य पक्षी भी है। पहाड़ी लोमड़ी, घोरल, हिरण और सांभर जैसे जानवर भी है।  Zoo हर सोमवार व राष्ट्रीय अवकाश और होली-दिवाली के मौके पर बंद रहता है। इस चिडियाघर में बहुत से जानवर रेस्क्यू करके भी लाए जाते रहे है। यदि कोई जानवर जख्मी हो जाता है उसे भी उपचार के लिए यही लाया जाता है। यह चिड़ियाघर प्रात 10 बजे से सांय 4 :30 तक खुलता है। इसकी टिकट दर प्रति व्यक्ति 50 व बच्चो के लिए 20 रुपए है। 

ज़ू में घुसते ही लाल रंग का पक्षी मिला वैसे यह मुर्गा जैसा दिख रहा था। इसी के पास ही जानवरो का हॉस्पिटल भी था। यहाँ में अकेला ही घूम रहा था क्योकि बाकि सभी तो पहले ही यहाँ आ चुके थे। अब मैं टाइगर (बाघ ) को देखने गया टाइगर अपने बाड़े (पिंजरे ) में आराम फरमा रहा था। वैसे यहाँ पर दो बाघ थे। यहाँ से आगे चला तो तिब्बती वॉल्फ (भेड़िया) दिख गया बेचारा परेशान सा नज़र आया वह इधर से उधर और उधर से इधर चक्कर लगाए जा रहा था। थोड़ी दूर पर ही लेपर्ड ( तेंदुआ ) का पिंजरा देखा एक तेंदुआ तो आराम से सो रहा था तो एक पानी पी रहा था। ये जानवर पिंजरे में ना हो तोह इतनी पास जाने की हिम्मत नहीं होगी चलो आगे चलते है आगे काला भालू मिल गया फोटो खिचवाने की मुद्रा में बैठा था। जंगल में बाघ ,तेंदुए से भी ख़तरनाक जानवर होता है यह भालू। भालू के पास ही हिरण के बाड़े (पिंजरे ) भी है वही पर अपनी टीम मिल गयी सभी बच्चे बड़े खुश नज़र आ रहे थे। यहाँ से थोड़ा ऊपर की तरफ भी लेपर्ड का पिंजरा था यह पिंजरा ज़ू का सबसे ऊँची जगह है।  चार पांच लेपर्ड आराम कर रहे थे। तभी एक लेपर्ड हमारे नजदीक आ गया वह बीमार सा लग रहा था उसकी दोनों आंखे सफ़ेद हो रखी थी। तभी वहां मौजूद ज़ू कर्मचारी ने बताया की यह एक आंख से अँधा और दूसरी से इसको कम दिखता है। थोड़ा नीचे आकर हिरन व भराल व भौकने वाला हिरन भी है। पास में गंगनाथ जी मंदिर के नाम से एक शिव मंदिर भी था। मंदिर में नहीं गया बस बाहर से ही हाथ जोड़ लिए। अब लगभग हमने सारा ज़ू देख ही लिया था इसलिए हम सभी ज़ू से बाहर आ गए और टैक्सी में बैठ कर नीचे मॉल रोड पर आ गए। मॉल रोड से दूसरी टैक्सी ले कर हम पार्किंग के पास पहुंचे और गुरूद्वारे के पास एक होटल पर लंच कर लिया और निकल पड़े अगली मंजिल की ओर  .........

 अब नैनीताल ज़ू के फोटो देखें। .. 
सुबहे नैनीताल 

एक चर्च माल रोड पर 





टिकट घर 


ज़ू का प्रवेश द्वार 

ज़ू से नैनी झील ऐसी दिखती है। 

मैं सचिन और प्रतीक गाँधी (मुंबई आया मेरा दोस्त ,दोस्त को सलाम करो )

मुर्गा जैसा दिखने वाला पक्षी 

बाघ 

भेड़िया 

गुलदार लेपर्ड 




बारहसींगा 

हिमालय काला भालू 




अँधा तेंदुआ 


भराल 


चीतल 




गंगनाथ मंदिर 

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हम लोग नैनीताल से निकल कर लगभग 11 किलोमीटर दूर भवाली पहुंचे। यह एक क़स्बा है लकिन हर जरुरत का सामान यहाँ मिल जाता है। यहाँ पर मार्किट भी काफी बड़ी है। जल्द ही हमने भवाली से रानीखेत वाला रास्ता पकड़ लिया या कहे की अल्मोड़ा मार्ग पर चल दिए। भवाली से निकले ही थे की कार के पिछले टायर में बहुत तेज़ आवाज आने लगी। कार रोकी नहीं बल्कि आगे की और चलाते रहे एक दुकान दिखी लकिन वो बंद थी वही एक व्यक्ति ने हमे बताया की आगे मोड़ पर भी एक दुकान है। मोड़ पर पहुंचे तो दुकान दिख गयी। लकिन दुकान का मालिक कही गया हुआ था हमने उसकी पंचर लगाने वाली किट उठा ली और खुद ही पंचर लगा डाला लकिन हवा अब भी निकल रही थी क्योकि टायर में पत्थर ने बड़ा कट लगा दिया था एक और पंचर लगा दिया अब हवा बहुत कम निकल रही थी फिर ललित के पास हवा भरने का पोर्टेबल कोम्प्रेस्सेर भी था इसलिए दुकान के पास बैठे एक बच्चे को पैसा दे दिए और बोल दिया की जब दुकान का मालिक आ जाये तो उसे दे देना। फिर हम वहां से चल पड़े भवाली से तरक़ीबन 7 किलोमीटर दूर कैंचीधाम मंदिर है जिसको बाबा नीव करोरी जी ने बनवाया था। मैं 10 साल पहले भी इस मंदिर में आया था जब इसे लोग इतना ज्यादा नहीं जानते थे आज तो शायद ही कोई इस मंदिर को नहीं जनता होगा। मंदिर में किसी भी प्रकार की फोटोग्राफी व वीडियोग्राफ़ी करना मना है। हनुमान मंदिर में जाकर हनुमान जी को प्रणाम किया फिर एक मंदिर जिसमे बाबा नीव करोरी जी की मूर्ति लगी थी वहां पर बैठ गए यहाँ पर बहुत शांति थी मंदिर में कोई घंटी भी नहीं बजा रहा था। अगर कोई शोर कानो में पड़ रहा था तो वो शोर पक्षियों का था जो पेड़ो पर बैठे हुए थे कुछ बंदर भी इधर से उधर घूम रहे थे। मंदिर में हमारे अलावा कुछ अंग्रेज भी थे जो ध्यान की मुद्रा में बैठे हुए थे। एक बेड पर बाबा का कंबल रखा हुआ था उसको छू कर माथे से लगाया और मंदिर से प्रसाद (उबले हुए चना) लेकर बाहर आ गया।
मंदिर के बाहर एक दुकान थी बिलकुल रोड पर वहां से पानी की बोतल ली गयी और चल पड़े अगली मंजिल की ओर .........


कैंची धाम मंदिर ,भवाली
परम पूज्य बाबा नीब करोरी महाराज जी ने इस मंदिर की नीव सन् 1964 में 15 जून को रखी । वैसे वह यहां पर सन् 1962 में ही आ गए थे। उन्होने सर्वप्रथम यहां पर हनुमान जी की मूर्ति को स्थापित किया था। बाबा का जन्म उत्तर प्रदेश फ़िरोज़ाबाद ज़िले के अकबरपुर गांव में ब्राह्मण परिवार में हुआ था फिर बाबा ने घर बार छोड़ दिया फिर बाबा 1962 में यहाँ आ गए। कहते है की एक बार यहां पर भंडारा लगाया गया और इसी दौरान घी खत्म हो गया तब बाबा जी ने पास वाली नदी से पानी मंगवाया और वह पानी चमत्कारी रूप से घी में परिवर्तित हो गया। आज बाबा तो नही रहे ( स्वर्गवासी 10 सितम्बर 1973 ) लेकिन उनका आशिर्वाद व हनुमान जी की कृप्या यहां पर सभी को मिलती है। एप्पल कंपनी के संस्थापक (स्टीव जॉब्स ) व फेसबुक के संस्थापक (मार्क जुकरबर्ग ) व अन्य बहुत बडी बडी हस्तियां यहां आकर बाबा जी का आशिर्वाद लेते है और यहाँ के जीवन की नई सोच ले जाते है और जीवन में अपार सफलता प्राप्त करते है। आज भी लोगो का यह मानना है की यहां पर सभी तकलीफ़े दूर हो जाती है।

कैंची धाम के फोटो देखें। ......
कैंची धाम मंदिर 

कैंची धाम 



देवांग और तनु 

मैं सचिन  त्यागी कैंची धाम मंदिर पर 


बाबा नीव करोरी जी महाराज 




कैंची धाम दूर से दिखता हुआ 
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